तल्ख़ हक़ीक़त

 तल्ख़ हक़ीक़त

चाहे कोई माने या न माने, सच्चाई यह है कि हमने हलाल और हराम का पूरा मतलब बस खाने-पीने तक बाँध कर रख दिया है,

जबकि असली हलाल-हराम तो हमारे कारोबार, हमारे लेन-देन, हमारे अख़लाक, हमारे रिश्तों और हमारे रोज़ाना के बर्ताव में नज़र आता है।

और हैरानी की बात यह है कि इन्हीं जगहों पर हम सबसे ज़्यादा आँखें मूँद लेते हैं।

याद रखिए — बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं।

हमारा हर अमल, हर बात, हर रवैया उन्हें हलाल और हराम का असली फर्क समझाता है।

अगर हम ही सही-ग़लत की परवाह न करें,

तो कल हमारे बच्चे भी हलाल-हराम को सिर्फ़ एक किस्सा समझकर छोड़ देंगे —

और यही सबसे बड़ी नाकामी होगी।


- Sk.Md.Saddam

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