एक मंज़र जिसने सोच बदल दी
एक बुज़ुर्ग और उनके दोस्त के बीच सच्ची दोस्ती थी। एक बार एक बुज़ुर्ग अपने ही दोस्त, दूसरे बुज़ुर्ग के पास आए और कहा कि मैं एक व्यापारिक यात्रा पर जा रहा हूँ।
सोचा कि जाने से पहले आपसे मुलाक़ात कर लूँ, क्योंकि अंदाज़ा है कि सफ़र में कई महीने लग जाएंगे।
लेकिन उम्मीद के ख़िलाफ़ वे कुछ ही दिनों में वापस लौट आए। जब दूसरे बुज़ुर्ग ने उन्हें मस्जिद में देखा तो हैरानी से पूछ बैठे — क्यों दोस्त! इतनी जल्दी लौट आए?
उन्होंने जवाब दिया: हज़रत! मैं क्या अर्ज़ करूँ, रास्ते में एक हैरतअंगेज़ मंज़र देखा और उल्टे पाँव ही घर लौट आया।
हुआ यूँ कि एक वीरान जगह पहुँचा। वहीं मैंने आराम के लिए पड़ाव डाला। अचानक मेरी नज़र एक ऐसे पक्षी पर पड़ी जो न देख सकता था और न उड़ सकता था। उसे देखकर मुझे तरस आया।
मैंने सोचा कि इस सुनसान जगह पर यह पक्षी अपनी खुराक कैसे पाता होगा?
मैं इसी सोच में था कि इतने में एक दूसरा पक्षी आया, जिसकी चोंच में कुछ था।
उसने आते ही वह चीज़ उस अपाहिज़ पक्षी के आगे डाल दी और अपाहिज़ पक्षी ने उसे उठाकर खा लिया। वह दूसरा पक्षी इस तरह कई चक्कर लगाता रहा, यहाँ तक कि अपाहिज़ पक्षी का पेट भर गया।
यह मंज़र देखकर मैंने कहा —
सुभान अल्लाह! जब अल्लाह तआला इस वीरान जगह पर एक पक्षी का रिज़्क़ पहुँचा सकता है, तो मुझे रिज़्क़ के लिए शहर-दर-शहर भटकने की क्या ज़रूरत है?
चुनाँचे मैंने आगे जाने का इरादा छोड़ दिया और वहीं से वापस लौट आया।
यह सुनकर दूसरे बुज़ुर्ग ने फ़रमाया —
दोस्त! तुम्हारी इस सोच से मुझे बहुत मायूसी हुई। तुमने आख़िर उस अपाहिज़ पक्षी जैसा बनना क्यों पसंद किया जिसकी ज़िंदगी दूसरों के सहारे चल रही है? तुमने यह क्यों नहीं चाहा कि तुम्हारी मिसाल उस पक्षी जैसी हो जो अपना पेट भी पालता है और दूसरों का पेट पालने की भी कोशिश करता है?
यह सुनकर वे बुज़ुर्ग बे-इख़्तियार उठे, अपने दोस्त का हाथ चूम लिया और कहा —
आपने मेरी आँखें खोल दीं। वाक़ई सही बात वही है जो आपने कही है।
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